एक लाख रुपए जुटाने की शर्त पर इंदौर आए थे बापू

एक लाख रुपए जुटाने की शर्त पर इंदौर आए थे बापू

इंदौर। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर मंगलवार 2 अक्टूबर को इंदौर में विविध कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इस मौके पर शहर बापू की उन यात्राओं को भी याद कर रहा है, जब बापू के चरण मालवा माटी के इस नगर में पड़े थे। बापू दो बार इंदौर आए। श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति के बुलावे पर पहली बार 29 मार्च 1918 को हि साहित्य सम्मेलन प्रयाग की अध्यक्षता करने आए थे। हालांकि वे 28 मार्च को ही इंदौर पहुंच गए थे। दूसरी बार भी बापू का इंदौर आना हिंदी साहित्य सम्मेलन में ही हुआ। दूसरी बार भी बापू हिंदी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए ही इंदौर आए। इस हिंदी सम्मेलन के लिए सभा मंडल बिस्को पार्क (अब नेहरू पार्क) में बनाया गया था। प्रवेश के लिए टिकट से प्रवेश दिया गया था। दरअसल, बापू ने इस सम्मेलन में आने के लिए एक लाख रुपए संग्रह की शर्त रखी थी। तब इतनी बड़ी रकम की गारंटी । जमनालाल बजाज ने ली थी। बापू आए तो उन्हें एक लाख रुपए की थैली भेंट की गई। उस मौके पर बापू ने कहा था कि इसका उपयोग केवल हिंदी प्रचार के लिए किया जाएगा। स्वयंसेवक बाल स्काउट्स थे सर सेठ हुकमचंद, सभापति डॉ. सरजू प्रसाद तिवारी, स्वागत अध्यक्ष काका कालेलकर ने लिपि परिषद की अध्यक्षता की। विज्ञान परिषद के अध्यक्ष डॉ. गोरख प्रसाद ने परिभाषिक कोष की प्रेरणा दी। साहित्य परिषद के सभापति आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘काव्य में अभिव्यंजनावाद’ निबंध पढ़ा। बापू ने जो भाषण दिए एक लिखित और दूसरा मौखिक, दोनों में उन्होंने शब्द रूपी दूध से दक्षिण को हिंदी से तृप्त करने की बात कही। बाद में महाराजा यशवंतराव होलकर द्वितीय ने आभार व्यक्त किया और सभा संपन्न हुई।

इंदौर से पांच हिंदी दूतों को अन्य राज्यों में भेजा

मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति इंदौर के प्रचार मंत्री अरविंद ओझा कहा कि महात्मा गांधी ने अष्टम हिंदी साहित्य सम्मेलन के दौरान इंदौर से पांच हिंदी दूतों को देश के उन राज्यों में भेजा था, जहां उस वक्त इस भाषा का ज्यादा प्रचलन नहीं था। हिंदी दूतों को देश के उन राज्यों में भेजा था। हिंदी दूतों में बापू के सबसे छोटे बेटे देवदास गांधी शामिल थे। हिंदी के प्रचार- प्रसार की इस अनोखी और ऐतिहासिक मुहिम के तहत हिंदी दूतों को सबसे पहले मद्रास प्रांत के लिए रवाना किया गया था। मद्रास में पदस्थ पंडित हरिहर शर्मा की सेवाओं का पूर्ण दायित्व समिति के द्वारा वहन किया जाता रहा।